जंतर मंतर पर ‘इस्तीफा’ देने वाला सिपाही निकला गैंगस्टर का साथी, उठे कई सवालनई
दिल्ली/देहरादून। दिल्ली के जंतर मंतर पर चल रहे CJP के आंदोलन के दौरान उत्तराखंड पुलिस के निलंबित सिपाही शेर सिंह द्वारा मंच से कथित “इस्तीफा” देने का मामला अब विवादों में घिर गया है। इस घटनाक्रम के बाद प्रशासनिक और पुलिस महकमे में कई गंभीर सवाल उठने लगे हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जो व्यक्ति पिछले एक वर्ष से अधिक समय से निलंबित है और सक्रिय सेवा में नहीं है, वह आखिर किस पद से इस्तीफा दे रहा है और इस घोषणा का वास्तविक औचित्य क्या है।जानकारी के अनुसार, शेर सिंह वर्ष 2025 से ही एक गंभीर आपराधिक मामले में नामजद होने के बाद निलंबित चल रहा है। उसके खिलाफ हरिद्वार के गंगनहर थाने में मुकदमा दर्ज किया गया था, जिसमें धोखाधड़ी, जालसाजी, फर्जी दस्तावेज तैयार करने और आपराधिक साजिश जैसी गंभीर धाराएं शामिल हैं। जांच एजेंसियों के मुताबिक, यह मामला किसी सामान्य विवाद का नहीं, बल्कि एक संगठित आपराधिक गिरोह से जुड़ा हुआ है।जांच में सामने आया कि हरिद्वार-रुड़की क्षेत्र के कुख्यात गैंगस्टर प्रवीण वाल्मीकि के गिरोह में शेर सिंह की सक्रिय भूमिका थी। प्रवीण वाल्मीकि पर हत्या, हत्या का प्रयास, अपहरण, अवैध वसूली और जमीनों पर कब्जे जैसे कई संगीन आरोप हैं और वह फिलहाल जेल में बंद है। आरोप है कि शेर सिंह ने अपने पुलिस पद का दुरुपयोग करते हुए इस गिरोह के साथ मिलकर स्थानीय लोगों को डराने-धमकाने और उनकी जमीनों पर अवैध कब्जा करने में सहयोग किया।प्रकरण में एक विधवा महिला का मामला विशेष रूप से सामने आया है। आरोप है कि गैंग ने महिला और उसके परिवार को लगातार धमकाया। यहां तक कि उसके परिजनों पर गोलीबारी की घटना भी सामने आई, जिसके बाद भय के कारण महिला को अपना घर छोड़ना पड़ा। इसी दौरान उसकी जमीन पर कब्जा कर उसे फर्जी तरीके से बेच दिया गया। जांच एजेंसियों का दावा है कि इस पूरे घटनाक्रम में शेर सिंह की भूमिका संदिग्ध ही नहीं, बल्कि सक्रिय रही।यह भी आरोप है कि शेर सिंह ने जेल और अदालत में गैंगस्टर प्रवीण वाल्मीकि से कई बार मुलाकात की और पीड़ित पक्ष पर मुकदमा वापस लेने के लिए दबाव बनाया। यहां तक कि पेशी के दौरान पीड़िता को आरोपी के सामने लाकर डराने-धमकाने की कोशिश भी की गई। इस तरह के आरोपों ने पुलिस विभाग की छवि पर भी सवाल खड़े किए हैं।मामले में पर्याप्त साक्ष्य मिलने के बाद शेर सिंह को 15 सितंबर 2025 को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था। बाद में 7 नवंबर 2025 को उसे उच्च न्यायालय, नैनीताल से जमानत मिल गई। गिरफ्तारी के तुरंत बाद विभाग ने उसे निलंबित कर दिया था और तब से वह सक्रिय पुलिस सेवा से बाहर है।ऐसे में जंतर मंतर के मंच से उसका “इस्तीफा” देना कई तरह की चर्चाओं को जन्म दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि निलंबित कर्मचारी का इस तरह सार्वजनिक रूप से इस्तीफा देने का कोई वैधानिक आधार नहीं होता, क्योंकि वह पहले से ही सेवा की सक्रिय भूमिका में नहीं होता। इस कारण इसे महज एक प्रतीकात्मक या राजनीतिक प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा है।पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या अब आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग भी आंदोलनों के मंच का इस्तेमाल कर रहे हैं। जंतर मंतर जैसे संवेदनशील स्थल पर इस तरह की घटनाएं सुरक्षा और विश्वसनीयता दोनों के लिहाज से चिंता का विषय बनती जा रही हैं।फिलहाल, इस मामले को लेकर न केवल पुलिस विभाग बल्कि आम जनता के बीच भी चर्चा तेज है। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि प्रशासन इस पूरे मामले पर क्या रुख अपनाता है और क्या इस तरह के मामलों पर कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे।

