July 30, 2026

क्लर्क से सफाई निरीक्षक तक बने प्रभारी ईओ, शहरी निकायों में तैनातियों से उठे सवाल

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उत्तराखंड के शहरी निकायों में अधिशासी अधिकारियों (ईओ) की तैनाती को लेकर शहरी विकास निदेशालय के हालिया आदेशों ने प्रशासनिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। विभाग ने नियमित ईओ की कमी को दूर करने के लिए क्लर्क, सफाई निरीक्षक, कर निरीक्षक और अकाउंट कर्मचारियों सहित विभिन्न संवर्गों के कर्मचारियों को प्रभारी अधिशासी अधिकारी की जिम्मेदारी सौंप दी है। इस फैसले के बाद न केवल विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं, बल्कि नियमों के अनुपालन को लेकर भी बहस तेज हो गई है।

दरअसल, शहरी विकास निदेशालय के पास वर्तमान में लगभग 60 अधिशासी अधिकारी हैं, जिनमें से कई को नगर निगमों में तैनात किया गया है। इसके चलते नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों में ईओ के पद खाली हो गए थे। इन रिक्त पदों को भरने के लिए विभाग ने अस्थायी व्यवस्था के तहत अन्य संवर्गों के कर्मचारियों को प्रभारी ईओ नियुक्त कर दिया है। ये सभी आदेश अपर सचिव एवं निदेशक शहरी विकास विनोद गिरी गोस्वामी के नाम से जारी किए गए हैं।

जारी आदेशों के अनुसार, अकाउंट कर्मचारी सतीश कुमार को नगर पालिका महुआखेड़ागंज, कर अधीक्षक हेमंत कुमार गुप्ता को नगर पंचायत लंढौरा, मुख्य सफाई निरीक्षक गुरमीत सिंह को भी लंढौरा, टैक्स वसूली कर्मचारी रोशन सिंह पुंडीर को नगर पालिका गौचर और कर निरीक्षक तारिक खान को नगर पालिका टिहरी में प्रभारी ईओ बनाया गया है। इसी क्रम में कर निरीक्षक सरोज गौतम को नानकमत्ता, पूजा को बाजपुर, क्लर्क अंकित राणा को पिरान कलियर, कुलदीप चौहान को ढंडेरा और यशवीर सिंह को तपोवन में जिम्मेदारी दी गई है।

इसके अलावा, अकाउंट कर्मचारी दीपक बुडलाकोटि को कालाढूंगी, क्लर्क भरत पंवार को देवप्रयाग, कुलदीप नैथानी को ऊखीमठ, राकेश कोटिया को जसपुर, सफाई निरीक्षक कुसुम मटूडा को उत्तरकाशी, वासुदेव डंगवाल को चमियाला, पंकज सिंह को लालकुआं और प्रेम सिंह रावत को बड़कोट में प्रभारी ईओ नियुक्त किया गया है। इन तैनातियों में खास बात यह है कि कई ऐसे कर्मचारी शामिल हैं, जो अपने सेवा काल में पदोन्नति के माध्यम से भी अधिशासी अधिकारी के पद तक नहीं पहुंच सकते थे।

यही कारण है कि इस व्यवस्था को लेकर सबसे अधिक आपत्ति उठाई जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड स्थानीय निकाय (केंद्रीकृत) सेवा नियमावली 2019 के तहत अधिशासी अधिकारी की नियुक्ति या तो पदोन्नति के माध्यम से होती है, जिसके लिए सात से आठ वर्ष की सेवा और वरिष्ठता आवश्यक है, या फिर यह भर्ती उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के जरिए की जाती है। ऐसे में अन्य संवर्गों के कर्मचारियों को सीधे ईओ का प्रभार देना नियमों के विपरीत माना जा रहा है।

इतना ही नहीं, उत्तर प्रदेश के वर्ष 2017 के एक आदेश में यह स्पष्ट किया गया था कि अधिशासी अधिकारी का प्रभार केवल एसडीएम स्तर के अधिकारी को ही दिया जा सकता है। उत्तराखंड में भी लंबे समय तक इसी व्यवस्था का पालन होता रहा है। लेकिन हालिया आदेशों ने इस परंपरा को बदलते हुए नई बहस को जन्म दे दिया है।

इस मुद्दे पर न्यायालय भी पहले हस्तक्षेप कर चुका है। दो मई 2025 को नैनीताल हाईकोर्ट ने निकायों में कर्मचारियों की कमी और प्रभारी व्यवस्था को लेकर एक अहम फैसला सुनाया था। अदालत ने सचिव शहरी विकास को निर्देश दिया था कि याचिकाकर्ता अनु पंत की याचिका पर चार माह के भीतर निर्णय लिया जाए। याचिका में आरोप लगाया गया था कि प्रदेश के अधिकांश निकायों में लिपिक संवर्ग के कर्मचारियों को अधिशासी अधिकारी सहित कई महत्वपूर्ण पदों का प्रभार दिया जा रहा है, जिससे न केवल प्रशासनिक कार्य प्रभावित हो रहे हैं बल्कि आम जनता को मिलने वाली बुनियादी सेवाएं भी बाधित हो रही हैं।

हालांकि, सरकार इस फैसले को मजबूरी बता रही है। शहरी विकास मंत्री राम सिंह कैड़ा का कहना है कि यह व्यवस्था पहले से चली आ रही है और जिन कर्मचारियों को प्रभारी ईओ बनाया गया है, वे पहले भी इस तरह की जिम्मेदारियां निभा चुके हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्य में ईओ के कई पद रिक्त हैं, जिसके चलते यह तैनातियां करनी पड़ी हैं।

फिलहाल, यह मामला प्रशासनिक जरूरत और नियमों के पालन के बीच संतुलन का बन गया है। एक ओर जहां सरकार इसे तात्कालिक समाधान के रूप में देख रही है, वहीं दूसरी ओर विशेषज्ञ और विपक्षी आवाजें इसे नियमों की अनदेखी और प्रशासनिक ढांचे के कमजोर होने का संकेत मान रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस व्यवस्था को स्थायी समाधान की दिशा में ले जाती है या फिर नियमों के अनुरूप नई भर्ती प्रक्रिया शुरू करती है।

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